हिमाचल प्रदेश विधानसभा के मंगलवार के सत्र में बहस का केंद्र बिंदु बने मछुआरों के हालात। देहरा से विधायक और मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी कमलेश ठाकुर ने सदन में उठाया यह सवाल कि पौंग डैम और हालिया बाढ़ के बाद मछुआरों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। बाढ़ के बाद जलाशय में जमा सिल्ट ने मछली पालन और कारोबार दोनों को प्रभावित किया। सवाल यह उठता है—क्या सरकार समय पर इस चुनौती का समाधान कर पाएगी?
आज हिमाचल विधानसभा शिमला में बजट सत्र के दौरान प्रश्नकाल की शुरुआत के साथ ही मछुआरों के संकट ने सदन की गरमी बढ़ा दी। देहरा से विधायक कमलेश ठाकुर ने कहा कि पौंग डैम बनने के बाद और 2023 की भीषण बाढ़ के कारण जल क्षेत्र में भारी मात्रा में सिल्ट जमा हो गई है। इसका सबसे बड़ा असर मछली पालन और मछुआरों की आजीविका पर पड़ा है। कई मछलियां मर रही हैं और कारोबार पूरी तरह प्रभावित हुआ है।
सदन में यह मुद्दा उठते ही अन्य विधायकों का ध्यान भी इस समस्या पर गया। कांग्रेस विधायक भवानी सिंह पठानिया और भाजपा विधायक जीत राम कटवाल ने भी कमलेश ठाकुर का समर्थन किया और समस्या के तुरंत समाधान की मांग की।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इस पर जवाब देते हुए बताया कि सरकार ने जलाशयों में जमा सिल्ट हटाने के लिए ड्रेजिंग की योजना बनाई है। पहले चरण में यह कार्य कुल्लू में शुरू होगा, उसके बाद मनाली और अंत में देहरा में किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि बजट में मछुआरों के लिए कई नई योजनाएं शामिल की गई हैं, जिससे उनका आर्थिक नुकसान कम हो सके और आजीविका को सुरक्षा मिले।
इस बीच, पूर्व विधायक बंबर ठाकुर ने भी विधानसभा परिसर में धरना देकर बिलासपुर में भ्रष्टाचार, अवैध माइनिंग और जमीन से जुड़े मामलों की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई। उन्होंने सुरक्षा की भी चिंता जताई और सरकार से अपने और परिवार के लिए सुरक्षा प्रदान करने का आग्रह किया।
इस पूरे सत्र ने यह दिखा दिया कि हिमाचल में न केवल पर्यावरण और कृषि संबंधी समस्याएं गंभीर हैं, बल्कि उन्हें हल करने के लिए सरकार सक्रिय भी है। मछुआरों और स्थानीय लोगों की उम्मीदें अब इस बात पर टिकी हैं कि ड्रेजिंग और बजट योजनाओं से उनका संकट जल्द कम होगा।









